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UP Politics: यूपी चुनाव से पहले बीजेपी की बढ़ी मुश्किलें, सहयोगी दलों का बदला रुख

UP Politics: यूपी विधानसभा चुनाव 2025 से पहले बीजेपी के लिए सहयोगी दलों की नाराज़गी मुश्किलें बढ़ा रही है। निषाद पार्टी और अपना दल सोनेलाल ने दबाव की राजनीति शु

Malvika
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2025-08-28
UP Politics: यूपी चुनाव से पहले बीजेपी की बढ़ी मुश्किलें, सहयोगी दलों का बदला रुख
UP Politics: यूपी चुनाव से पहले बीजेपी की बढ़ी मुश्किलें, सहयोगी दलों का बदला रुख
UP Politics: यूपी विधानसभा चुनाव 2025 से पहले बीजेपी के लिए सहयोगी दलों की नाराज़गी मुश्किलें बढ़ा रही है। निषाद पार्टी और अपना दल सोनेलाल ने दबाव की राजनीति शुरू कर दी है। संजय निषाद ने यहां तक कह दिया कि अगर फायदा नहीं है तो गठबंधन तोड़ दें।

UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2025 नज़दीक आते ही राजनीतिक समीकरण बदलने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) जो अब तक छोटे दलों को साथ लेकर सत्ता में मजबूत रही है, अब उन्हीं सहयोगियों की नाराज़गी का सामना कर रही है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष और मंत्री संजय निषाद का हालिया बयान भाजपा के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि अगर भाजपा को छोटे दलों से फायदा नहीं दिखता तो वह गठबंधन तोड़ सकती है।

यह बयान केवल एक चेतावनी भर नहीं, बल्कि सत्ता के अंदर दबाव की राजनीति का हिस्सा है। इससे पहले भाजपा की एक और सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) भी कई बार अपनी असहमति जता चुकी है। ऐसे में चुनाव से पहले भाजपा के सामने अपने सहयोगियों को साधने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।


संजय निषाद का बड़ा बयान – “फायदा नहीं तो गठबंधन तोड़ दें”

हाल ही में पत्रकारों से बातचीत में संजय निषाद ने कहा –
“अगर भाजपा को लगता है कि छोटे दलों से उसे कोई फायदा नहीं है तो वह गठबंधन तोड़ सकती है। लेकिन, भाजपा अपने स्थानीय नेताओं से हम पर हमले कराना बंद करे, नहीं तो दोस्ती निभाना मुश्किल हो जाएगा।”

संजय निषाद ने अपने बयान में केवल अपनी पार्टी का ही जिक्र नहीं किया बल्कि राष्ट्रीय लोकदल (RLD) और ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा (SBSP) को भी इसमें शामिल कर लिया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि साल 2019 में जब सपा-बसपा गठबंधन मजबूत था, तब भी भाजपा ने छोटे दलों की मदद से बड़ी जीत दर्ज की थी।


निषाद पार्टी की ताकत और भाजपा की चिंता

भले ही विधानसभा चुनाव 2022 में निषाद पार्टी को केवल 6 सीटों पर जीत मिली हो, लेकिन इनकी असली ताकत पूर्वांचल के मतदाताओं में है।

  • पूर्वांचल में निषाद समाज का वोट बैंक 70 से अधिक सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है।

  • साल 2022 में निषाद समाज ने भाजपा को बड़े पैमाने पर समर्थन दिया था।

  • संजय निषाद मंत्री भी बने और भाजपा का सहयोगी बने रहे।

लेकिन, समय-समय पर निषाद समाज को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने की मांग अधूरी रह गई। यह वही मुद्दा है जो अब भाजपा और निषाद पार्टी के बीच विवाद की वजह बन रहा है।


अपना दल (सोनेलाल) की नाराज़गी

भाजपा के लिए केवल निषाद पार्टी ही चुनौती नहीं है।

  • अपना दल (सोनेलाल) का आधार कुर्मी समाज है, जिनका प्रभाव प्रदेश की 30-35 सीटों पर है।

  • कुर्मी समाज उत्तर प्रदेश में ओबीसी की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है।

  • अनुप्रिया पटेल की अगुवाई में इस दल ने भाजपा को कई सीटों पर बढ़त दिलाई है।

लेकिन, पार्टी ने कई बार इशारों-इशारों में भाजपा को चेतावनी दी है कि उनके मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह भविष्य में अलग रास्ता भी चुन सकती है।


छोटे दलों की राजनीति और भाजपा का समीकरण

यूपी की राजनीति में छोटे दलों की भूमिका हमेशा अहम रही है।

  • ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा (SBSP),

  • जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल (RLD),

  • निषाद पार्टी,

  • और अपना दल (सोनेलाल)

ये सभी दल क्षेत्रीय स्तर पर बड़ी पकड़ रखते हैं और भाजपा को चुनावी फायदा दिलाते हैं। लेकिन अब वही दल भाजपा के लिए सिरदर्द बन रहे हैं।


भाजपा की रणनीति – दोस्ती निभाए या नया रास्ता?

भाजपा फिलहाल सहयोगियों की नाराज़गी को शांत करने की कोशिश कर रही है।

  • चुनावी साल में गठबंधन तोड़ने का खतरा बड़ा नुकसान कर सकता है।

  • भाजपा जानती है कि बिना छोटे दलों के समर्थन के उसका गणित गड़बड़ा सकता है।

  • विपक्ष (सपा और कांग्रेस) छोटे दलों को अपने पाले में लाने की कोशिश पहले से ही कर रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा को हर हाल में इन सहयोगियों को साथ बनाए रखना होगा, वरना नतीजे प्रभावित हो सकते हैं।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2025 भाजपा के लिए केवल विपक्ष से मुकाबला करने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने सहयोगी दलों को साधने की भी जंग है। संजय निषाद का बयान भाजपा को यह याद दिलाने के लिए काफी है कि छोटे दलों के बिना सत्ता का रास्ता मुश्किल हो सकता है। अगर भाजपा ने समय रहते इन नाराज़गियों को दूर नहीं किया तो इसका असर चुनावी नतीजों पर साफ दिखाई देगा।

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Author of Bolbindas

Contributor and Lead Editor. Writing deep insights and analytical commentaries.

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