आज के डिजिटल युग में हम अपनी सुबह की शुरुआत फेसबुक, गूगल या इंस्टाग्राम पर न्यूज हेडलाइंस पढ़कर करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस खबर को लिखने के लिए एक पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालता है और एक मीडिया हाउस करोड़ों रुपये खर्च करता है, उस खबर से असली मलाई कौन खा रहा है? जवाब है—टेक दिग्गज (Big Tech)। लेकिन अब इस खेल के नियम बदलने जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने एक बार फिर दुनिया को दिखाया है कि तकनीक की ताकत के आगे पत्रकारिता के हितों की रक्षा कैसे की जाती है।
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने अपने ‘न्यूज मीडिया बारगेनिंग कोड’ (News Media Bargaining Code) को और अधिक सख्त बनाने और उसके दायरे में विस्तार करने का फैसला लिया है। यह कानून दुनिया भर में एक मिसाल बन गया है, जो गूगल (Google) और मेटा (Meta/Facebook) जैसी कंपनियों को मजबूर करता है कि वे न्यूज पब्लिशर्स के कंटेंट का उपयोग करने के एवज में उन्हें उचित भुगतान करें।
1. ‘न्यूज बारगेनिंग कोड’ क्या है और यह क्यों जरूरी है?
सरल शब्दों में समझें तो यह एक ऐसा समझौता है जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म (जैसे गूगल और फेसबुक) को उन समाचार संगठनों के साथ बातचीत करनी होती है जिनकी खबरें वे अपने प्लेटफॉर्म पर दिखाते हैं।
अभी तक होता यह था कि गूगल सर्च या फेसबुक फीड पर आप खबरें पढ़ते थे, जिससे इन प्लेटफॉर्म्स को भारी विज्ञापन (Advertisement) मिलता था, लेकिन जिस मीडिया हाउस ने वह खबर बनाई, उसे उसका बहुत छोटा हिस्सा या कुछ भी नहीं मिलता था। ऑस्ट्रेलिया का तर्क है कि मीडिया हाउस ‘कंटेंट’ बनाते हैं, जबकि टेक कंपनियां उस कंटेंट से ‘मुनाफा’ कमाती हैं। इस असंतुलन को खत्म करने के लिए यह कानून लाया गया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, जब से यह कानून प्रभावी हुआ है, गूगल और मेटा ने ऑस्ट्रेलियाई मीडिया घरानों के साथ $200 मिलियन (लगभग 1,600 करोड़ रुपये) से अधिक के सौदे किए हैं। अब नए नियमों के तहत, सरकार उन कंपनियों को दंडित भी कर सकती है जो बातचीत की मेज पर आने से इनकार करती हैं।
2. गूगल और मेटा की नाराजगी: क्या खबरें दिखना बंद हो जाएंगी?
ऑस्ट्रेलिया के इस सख्त रुख से टेक कंपनियों में खलबली मची है। मेटा (मार्क जुकरबर्ग की कंपनी) ने पहले भी धमकी दी थी कि अगर उन्हें पैसे देने के लिए मजबूर किया गया, तो वे ऑस्ट्रेलिया में फेसबुक पर न्यूज दिखाना पूरी तरह बंद कर देंगे। कनाडा में भी इसी तरह का कानून आने पर मेटा ने न्यूज शेयरिंग को ब्लॉक कर दिया था।
वहीं गूगल का रुख थोड़ा लचीला रहा है, लेकिन वह भी इस कानून को ‘इंटरनेट की आजादी’ के खिलाफ बताता रहा है। टेक दिग्गजों का कहना है कि वे मीडिया वेबसाइट्स को भारी ‘ट्रैफिक’ भेजते हैं, जिससे उन्हें फायदा होता है, इसलिए उन्हें अलग से पैसे देने की जरूरत नहीं है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया ने साफ कर दिया है कि पब्लिशर्स के बिना ये प्लेटफॉर्म सिर्फ ‘खाली डिब्बे’ हैं, इसलिए भुगतान तो करना ही होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया का यह कदम एक ‘डोमिनो इफेक्ट’ पैदा करेगा। अगर ऑस्ट्रेलिया इसमें पूरी तरह सफल रहता है, तो दुनिया के अन्य देश भी इसी रास्ते पर चलेंगे।
3. भारत के लिए सबक: क्या भारतीय मीडिया को भी मिलेगा उसका हक?
ऑस्ट्रेलिया की इस जीत ने भारत में भी एक नई बहस छेड़ दी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार है। यहां करोड़ों लोग अपनी खबरों के लिए गूगल और फेसबुक पर निर्भर हैं। ‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ (DNPA) लंबे समय से भारत सरकार से मांग कर रहा है कि यहां भी ऑस्ट्रेलिया जैसा कानून लाया जाए।
भारत में स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि यहां डिजिटल विज्ञापनों का करीब 70% से 80% हिस्सा गूगल और फेसबुक के पास चला जाता है, जबकि सारा खर्च स्थानीय मीडिया हाउस उठाते हैं। भारत सरकार वर्तमान में नए ‘डिजिटल इंडिया एक्ट’ पर काम कर रही है। उम्मीद की जा रही है कि इस कानून में ‘रेवेन्यू शेयरिंग’ (राजस्व साझाकरण) का एक स्पष्ट प्रावधान होगा।
अगर भारत में यह लागू होता है, तो क्षेत्रीय अखबारों और डिजिटल पोर्टलों को अरबों रुपये का राजस्व मिल सकता है, जिससे पत्रकारिता की गुणवत्ता में सुधार होगा और फेक न्यूज से लड़ने में मदद मिलेगी।
ऑस्ट्रेलिया का यह फैसला सिर्फ पैसों की बात नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र पत्रकारिता के अस्तित्व की लड़ाई है। जब तक कंटेंट बनाने वालों को उनके काम का सही दाम नहीं मिलेगा, तब तक पत्रकारिता पर संकट बना रहेगा। ऑस्ट्रेलिया ने रास्ता दिखा दिया है; अब देखना यह है कि भारत और बाकी दुनिया इस पर कितनी जल्दी अमल करती है।
FAQ
1. क्या इस कानून के बाद फेसबुक-गूगल पर न्यूज पढ़ना पेड हो जाएगा?
नहीं, यह कानून पब्लिशर्स और टेक प्लेटफॉर्म्स के बीच के व्यापारिक समझौते के बारे में है। आम पाठकों के लिए खबरें अभी भी फ्री रहेंगी, बस विज्ञापन से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा अब सीधे मीडिया हाउस को मिलेगा।
2. मेटा (फेसबुक) ने ऑस्ट्रेलिया में न्यूज ब्लॉक क्यों की थी?
मेटा का तर्क था कि न्यूज पब्लिशर्स उनके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल मुफ्त में ट्रैफिक पाने के लिए करते हैं। जब सरकार ने उन्हें पैसे देने के लिए कानून बनाया, तो विरोध स्वरूप उन्होंने न्यूज ब्लॉक कर दी थी, हालांकि बाद में बातचीत के जरिए समाधान निकाला गया।
3. क्या भारत में ऐसा कोई कानून फिलहाल मौजूद है?
फिलहाल भारत में ऐसा कोई विशेष ‘न्यूज बारगेनिंग कोड’ नहीं है, लेकिन भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) गूगल के खिलाफ एकाधिकार (Monopoly) की जांच कर रहा है। सरकार नए डिजिटल नियमों के जरिए पब्लिशर्स को हक दिलाने पर विचार कर रही है।
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