NCERT controversy: भारत की शिक्षा व्यवस्था और न्याय प्रणाली, दोनों ही देश के मजबूत स्तंभ हैं। लेकिन सोचिए क्या होगा जब शिक्षा देने वाली सबसे बड़ी संस्था ही न्यायपालिका पर सवाल उठाने लगे? हाल ही में भारत में कुछ ऐसा ही हुआ जिसने सुप्रीम कोर्ट से लेकर आम जनता तक को हिलाकर रख दिया। मामला कक्षा 8 की एक सोशल साइंस (सामाजिक विज्ञान) की किताब से जुड़ा है, जिस पर मचे बवाल के बाद अब NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) को सार्वजनिक रूप से झुकना पड़ा है।
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आखिर क्या था उस ‘विवादित’ अध्याय में?
पूरा विवाद कक्षा 8 की नई किताब “Exploring Society: India and Beyond (Part-II)” के चौथे अध्याय को लेकर शुरू हुआ। इस अध्याय का शीर्षक था— “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका”। सुनने में यह एक सामान्य पाठ लगता है, लेकिन इसकी गहराई में कुछ ऐसी बातें लिखी गई थीं जो देश की सर्वोच्च अदालत को नागवार गुजरीं। किताब के एक हिस्से में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” (Corruption in Judiciary) जैसे संवेदनशील विषय पर चर्चा की गई थी।
जैसे ही यह मामला मीडिया और कानूनी विशेषज्ञों की नजर में आया, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया। अदालत का मानना था कि छोटी उम्र के बच्चों के मन में न्यायपालिका के प्रति ऐसी नकारात्मक छवि बनाना न केवल गलत है, बल्कि यह संस्था की गरिमा को भी ठेस पहुँचाता है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और CJI का कड़ा रुख
इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद सख्त रहा। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि, “किसी को भी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और भरोसे को नुकसान पहुँचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।” अदालत ने साफ लहजे में चेतावनी दी कि कानून सबके लिए बराबर है और संस्थान की गरिमा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
अदालत ने तुरंत आदेश जारी किया कि:
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इस किताब की जितनी भी प्रतियां छपी हैं, उन्हें तुरंत जब्त (Seize) किया जाए।
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इंटरनेट से इस किताब के डिजिटल वर्जन (PDF) को स्थायी रूप से हटाया जाए।
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शिक्षा मंत्रालय और NCERT इस पर जवाब दाखिल करें।
NCERT की ‘सार्वजनिक माफी’ और सरेंडर
सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों और चौतरफा दबाव के बाद, NCERT ने वो किया जो भारत के इतिहास में कम ही देखने को मिलता है। परिषद ने देश के प्रमुख अखबारों में बाकायदा विज्ञापन जारी कर ‘बिना शर्त और पूर्ण माफी’ मांगी। NCERT के निदेशक ने स्वीकार किया कि इस अध्याय में ऐसी सामग्री का शामिल होना एक “गलत निर्णय” और “अनजानी भूल” थी।
परिषद ने स्पष्ट किया कि उन्होंने पूरी किताब को बाजार और स्कूलों से वापस ले लिया है। अब यह विवादित किताब न तो दुकानों पर मिलेगी और न ही ऑनलाइन उपलब्ध होगी। यहाँ तक कि सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कोर्ट में खड़े होकर शिक्षा मंत्रालय की तरफ से इस गलती के लिए माफी मांगी।
क्या यह सिर्फ एक ‘गलती’ थी या कुछ और?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी बड़ी संस्था से इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? क्या बच्चों के सिलेबस को रिव्यू करने वाली कमेटी ने इस पर ध्यान नहीं दिया? NCERT ने फिलहाल इस मामले की आंतरिक जांच के आदेश दे दिए हैं। वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर यह ‘भ्रष्टाचार’ वाला हिस्सा किताब के फाइनल ड्राफ्ट में पहुँचा कैसे।
बच्चों की शिक्षा और संस्थाओं का सम्मान
यह मामला हमें सिखाता है कि शिक्षा का उद्देश्य जागरूक नागरिक बनाना है, लेकिन तथ्यों और संस्थागत गरिमा के बीच एक बारीक रेखा होती है। अगर बच्चों के मन में शुरू से ही देश की सर्वोच्च संस्थाओं के प्रति अविश्वास के बीज बो दिए जाएंगे, तो भविष्य की नींव कमजोर हो सकती है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने एक बड़े विवाद को शांत कर दिया है, लेकिन शिक्षा जगत के लिए यह एक बड़ा सबक है।
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