SSC: शिक्षा जगत में भूचाल! कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने हजारों उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. स्कूल सर्विस कमीशन (SSC) की नई भर्ती प्रक्रिया में ‘दागी’ या ‘दूषित’ (tainted) माने जाने वाले उम्मीदवारों को शामिल करने की राज्य सरकार (state government) की दलीलों को कोर्ट ने करारा झटका दिया है. कोर्ट ने कहा कि सरकार का यह रवैया ‘ठीक से समझा नहीं गया’ और यह ‘गलत संकेत’ भेजता है. आइए जानते हैं इस पूरे मामले की तह तक और कोर्ट के कड़े रुख के पीछे की वजह.
कलकत्ता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘दागी’ उम्मीदवारों को नौकरी का मौका नहीं!
कलकत्ता हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस सौमेन सेन (Soumen Sen) और जस्टिस स्मिता दास डे (Smita Das De) शामिल थीं, ने गुरुवार को उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें स्कूल सर्विस कमीशन (SSC) द्वारा 35,000 से अधिक रिक्तियों (over 35,000 vacancies) के लिए आयोजित की जा रही नई भर्ती प्रक्रिया में ‘दागी’ उम्मीदवारों को आवेदन करने की अनुमति देने की मांग की गई थी.
SSC और राज्य सरकार का तर्क: क्या था उनका कहना?
वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी (Senior advocate Kalyan Banerjee), जो SSC का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने ‘दागी’ उम्मीदवारों की नियुक्तियां रद्द करने (termination of appointments) और वेतन वापस करने (refund of salaries) का निर्देश तो दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के किसी भी फैसले में भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं में भाग लेने पर स्पष्ट प्रतिबंध (clear bar) नहीं लगाया गया था.
वहीं, राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता (Advocate General Kishore Datta) ने प्रस्तुत किया कि ‘दागी’ उम्मीदवारों को बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 16 (Article 16 of the Constitution) का उल्लंघन होगा. दत्ता ने कहा कि नियुक्ति रद्द होने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में रोजगार के सभी दरवाजे बंद हो गए हैं.
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘सरकार को गलत काम करने वालों का साथ नहीं देना चाहिए!’
लेकिन हाई कोर्ट इन दलीलों से बिलकुल सहमत नहीं था. कोर्ट ने कहा, “यह वास्तव में चौंकाने वाला और भ्रमित करने वाला है कि याचिकाकर्ता (appellants) ‘दागी’ उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं. माननीय डिवीजन बेंच और माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में उल्लिखित तीनों श्रेणियों के उम्मीदवार किसी भी तरह के विचार के पात्र नहीं हैं. यह तर्क कि इन उम्मीदवारों को समान अवसर (level playing field) मिलना चाहिए, जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 (Article 16 of the Constitution of India) पर आधारित है, स्पष्ट रूप से स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह न्याय और निष्पक्षता की मूल धारणा (basic notion of justice and fairness) के विरुद्ध है.”
कोर्ट ने आगे कहा, “राज्य की यह मौलिक नीति (fundamental policy) नहीं हो सकती कि वह धोखेबाजों (fraudsters) को सार्वजनिक रोजगार (public employment) में प्रोत्साहित करे. सिस्टम में उनका कोई स्थान नहीं है.”
शिक्षक का महत्व और ‘धोखेबाज’ शिक्षक का दर्दनाक सच!
कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक शिक्षक केवल छात्र के लिए एक गुरु, सहायक और आदर्श (mentor, facilitator and role model) ही नहीं होता, बल्कि वह ज्ञान और कृतज्ञता का मार्गदर्शक प्रकाश (guiding light of wisdom and gratitude) भी होता है. बेनी माधव दास (Beni Madhab Das), सूर्य सेन (Surya Sen) और इतिहास के अन्य महान शिक्षकों का जिक्र करते हुए, HC ने कहा, “…यह वास्तव में दर्दनाक है कि राज्य की उच्च शिक्षा प्रणाली में दूषित हाथों वाले उम्मीदवारों (candidates with tainted hands) के कारणों का बचाव किया जा रहा है.”
कोर्ट ने कहा, “एक शिक्षक को तब धोखेबाज कहा जाता है जब वह अनुचित साधनों से नौकरी हासिल करता है, जो किसी भी कल्पना से पूरी तरह से अकल्पनीय और अस्वीकार्य है. एक शिक्षक जिसे आवश्यक ज्ञान, कौशल और मूल्यों के साथ ठीक से नियुक्त नहीं किया गया है, वह एक आपदा होगी, जो शिक्षा प्रणाली को बर्बाद कर देगा (ruining the education system). ज्ञान, बुद्धिमत्ता और उचित शिक्षा (Knowledge, wisdom, and proper education) राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक हैं.”
‘धोखाधड़ी सब कुछ दूषित कर देती है!’ – न्याय का सिद्धांत!
अंत में, कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत को दोहराया: “धोखाधड़ी सब कुछ दूषित कर देती है (Fraud vitiates everything). धोखाधड़ी और मिलीभगत किसी भी सभ्य न्यायशास्त्र में सबसे गंभीर मिसालों को दूषित कर देती है. धोखाधड़ी और न्याय साथ-साथ नहीं रह सकते. एक वादी जो अनुचित साधनों और मिलीभगत से सार्वजनिक रोजगार का कोई भी लाभ प्राप्त करने का दोषी है, वह रिट क्षेत्राधिकार (writ jurisdiction) के तहत कोई उपाय नहीं मांग सकता है, जो विवेकाधीन (discretionary) प्रकृति का है, और यह विवेक न्यायसंगत रूप से और सद्भावना को बढ़ावा देने में प्रयोग किया जाना चाहिए.”
यह फैसला शिक्षा प्रणाली की पवित्रता (sanctity of the education system) और निष्पक्ष भर्ती (fair recruitment) को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. यह स्पष्ट करता है कि गलत तरीकों से नौकरी पाने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए सरकारी नौकरी का रास्ता बंद रहेगा.
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