Supreme Court : क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस काम को करने में दुनिया की सबसे शक्तिशाली अदालतें सालों लगा देती हैं, उसे भारत के मुट्ठी भर जजों ने महज एक साल में कर दिखाया? साल 2025 भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 75,000 से भी ज्यादा केसों का निपटारा कर एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसे देखकर वाशिंगटन से लेकर लंदन तक के कानूनविद् हैरान हैं।
दुनिया के लिए एक ‘नामुमकिन’ नजीर
अगर हम तुलना करें, तो आँकड़े आपकी आँखें खोल देंगे। जहाँ अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट हर साल मुश्किल से 70 से 80 मामलों पर बहस कर पाता है, वहीं ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत ने पिछले साल केवल 50 के करीब फैसले सुनाए। इसके ठीक विपरीत, हमारे सुप्रीम कोर्ट ने 1,400 बड़े फैसले सुनाए और हजारों आदेश जारी कर लाखों लोगों को न्याय की उम्मीद दी। यह संख्या किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि भारत में जजों की संख्या और जनसंख्या का अनुपात दुनिया में सबसे चुनौतीपूर्ण है।
अकेले लड़ते हमारे जज: 1 जज और 4.5 करोड़ की आबादी
हैरानी की बात यह है कि भारत में जजों की संख्या आबादी के मुकाबले विश्व में सबसे कम है। अमेरिका में प्रति 10 लाख की आबादी पर 150 जज हैं, जबकि भारत में यह संख्या मात्र 21 है। सुप्रीम कोर्ट की बात करें तो यहाँ जजों की स्वीकृत संख्या केवल 34 है। अगर भारत की 150 करोड़ की आबादी को देखें, तो हमारे देश में करीब 4.5 करोड़ लोगों के हिस्से में सुप्रीम कोर्ट का सिर्फ एक जज आता है। इतने भारी दबाव के बावजूद 75,000 केस निपटाना भारतीय जजों के अटूट समर्पण और कड़ी मेहनत का प्रमाण है।
मीडिएशन: क्या यही है भविष्य का समाधान?
इतने बड़े बोझ को कम करने के लिए अब नए रास्तों की तलाश की जा रही है। हाल ही में एक नेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक बहुत ही व्यावहारिक समाधान पेश किया—मीडिएशन (Mediation) यानी मध्यस्थता। उन्होंने कहा कि हमें परंपरागत अदालती लड़ाई के बजाय आपसी सहमति से मामलों को सुलझाने की दिशा में बढ़ना होगा। मीडिएशन न केवल अदालतों का बोझ कम करेगा, बल्कि दोनों पक्षों के बीच कड़वाहट को भी खत्म करेगा।
जजों की कमी: न्याय के मंदिर की पुकार
पूर्व चीफ जस्टिस (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ भी कई बार इस बात पर जोर दे चुके हैं कि न्यायपालिका को और अधिक जजों की सख्त जरूरत है। 2019 में जजों की संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी, लेकिन बढ़ते मुकदमों के बोझ को देखते हुए यह ऊंट के मुँह में जीरे के समान है। न्याय की रफ्तार को और तेज करने के लिए जजों की संख्या में बढ़ोतरी करना अब समय की मांग बन चुकी है। 75,000 केस का निपटारा करना केवल एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की जीत है जो बरसों से अदालत की सीढ़ियां चढ़ रहे थे। भारत का सुप्रीम कोर्ट आज दुनिया भर की न्यायपालिकाओं के लिए एक ‘रोल मॉडल’ बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम अपने जजों को वह संसाधन और संख्या दे पा रहे हैं, जिसके वे हकदार हैं?
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