States

Supreme Court on Allahabad Highcourt Bail: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को लगाई फटकार, 43 बार स्थगित जमानत सुनवाई पर कहा

Supreme Court on Allahabad Highcourt Bail: भारत का न्यायिक तंत्र लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींव माना जाता है। न्यायपालिका का दायित्व है कि वह हर नागरिक के अधिकारो

admin
admin
2025-08-28
Supreme Court on Allahabad Highcourt Bail: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को लगाई फटकार, 43 बार स्थगित जमानत सुनवाई पर कहा
Supreme Court on Allahabad Highcourt Bail: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को लगाई फटकार, 43 बार स्थगित जमानत सुनवाई पर कहा

Supreme Court on Allahabad Highcourt Bail: भारत का न्यायिक तंत्र लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींव माना जाता है। न्यायपालिका का दायित्व है कि वह हर नागरिक के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करे। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामला रामनाथ मिश्रा नामक एक आरोपी से जुड़ा है, जो साढ़े तीन साल से अधिक समय से जेल में बंद है और जिसकी जमानत याचिका पर 43 बार सुनवाई स्थगित की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर न सिर्फ नाराज़गी जताई बल्कि साफ कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को अदालतों द्वारा प्राथमिकता के साथ सुनना चाहिए।


मामला क्या है?

उत्तर प्रदेश के रामनाथ मिश्रा उर्फ़ रमानाथ मिश्रा के खिलाफ सीबीआई के कई मामले दर्ज हैं। वह वर्ष 2021 से अधिक समय से जेल में बंद हैं। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उनकी याचिका पर सुनवाई 43 बार टलती रही। इतना ही नहीं, सह-आरोपी को मई 2024 में राहत मिल चुकी थी, लेकिन रामनाथ मिश्रा की याचिका पर सुनवाई लगातार टलती रही। इस पर उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।


सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

25 अगस्त को सुनवाई के दौरान CJI बी.आर. गवई और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा: “हाईकोर्ट द्वारा 43 बार स्थगन दिया जाना उचित नहीं है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का मज़ाक उड़ाने जैसा है।” सीजेआई ने आगे कहा कि जब मामला नागरिक की स्वतंत्रता से जुड़ा हो, तो अदालतों को अत्यधिक तत्परता के साथ फैसला सुनाना चाहिए।


याचिकाकर्ता की दलीलें

वरिष्ठ अधिवक्ता यशराज सिंह देवड़ा, जो याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए, ने अदालत को बताया कि:

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 27 बार सुनवाई स्थगित की।

  • इतने लंबे समय से आरोपी जेल में है।

  • सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है।


सरकार का पक्ष

सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.डी. संजय ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि:

  • मामला हाईकोर्ट में लंबित है।

  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत देना गलत मिसाल पेश करेगा।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि बार-बार स्थगन देना न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।


सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि रामनाथ मिश्रा किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।


26 अगस्त को भी जताई थी चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने इससे एक दिन पहले भी इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। अदालत ने कहा कि:

  • दिसंबर 2021 में एक आपराधिक अपील की सुनवाई पूरी हो गई थी।

  • लेकिन आज तक फैसला नहीं सुनाया गया।

यह स्थिति चौंकाने वाली और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।


व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि – “किसी भी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता, सिवाय इसके कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार।” यानी अदालतों की यह जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों की स्वतंत्रता को जल्द से जल्द सुनिश्चित करें। लंबे समय तक सुनवाई टलना इस अधिकार का हनन है।


विशेषज्ञों की राय

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायपालिका को आत्ममंथन करने पर मजबूर करेगा।

  • सुप्रीम कोर्ट का यह रुख भविष्य में जमानत मामलों को प्राथमिकता दिला सकता है।

  • इससे हाईकोर्ट और निचली अदालतों पर दबाव बनेगा कि वे समयबद्ध तरीके से फैसले सुनाएँ।


जनता की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर भी सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर जमकर चर्चा हुई।

  • कई लोगों ने कहा कि न्याय में देरी होना न्याय से इंकार करने के बराबर है।

  • वहीं कुछ ने कहा कि यह न्यायपालिका के कामकाज पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक आरोपी की जमानत का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे न्याय तंत्र के लिए एक बड़ा सबक है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि:

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है।

  • अदालतों को सुनवाई टालने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी।

  • न्याय तभी सार्थक है, जब समय पर मिले।

यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के लिए नई दिशा तय कर सकता है।

Enjoying this post?

Subscribe to Bolbindas to get deep dives like this delivered directly to your inbox .

admin

admin

Author of Bolbindas

Contributor and Lead Editor. Writing deep insights and analytical commentaries.

More from Bolbindas

No other posts found.